आस्था : श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया श्रावणी तीज के नाम से प्रचलित है। भारत के उत्तरी क्षेत्र में तीज के त्यैहार की विशेष धूम रहती है। तीज का त्यौहार मुख्यतः स्त्रियों का त्यौहार है। इस दिन महिलायें प्रफुल्लित मन से गीत-गाती, झूला झूलती और नाचती है। ऐसी मान्यता है कि तीज के दिन माॅ भगवती का सौ वर्षो की तपस्या व साधना के बाद भगवान शिव से मिलन हुआ था। इस बार हरियाली तीज 3 अगस्त दिन शनिवार को पड़ रही है। इस दिन स्त्रियां निर्जल रहकर व्रत रखती है। अपने घर को साफ व स्वच्छ करके तोरण से घर को सजायें उसके बाद एक पवित्र चैकी पर शुद्ध मिटटी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, रिद्ध-सिद्ध एंव गणेश पार्वती की प्रतिमा बनायें। देवताओं का आवाहन कर विधिवत षोडशोपचार पूजन करें। इस व्रत का पूजन रात्रि भर चलता है। महिलायें रात्रि जागरण करके कथा-कीर्तन व पूजन करती है। रात्रि के प्रत्येक पहर में भगवान शिव व पार्वती पर बिल्वपत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते व केवड़ा अपर्ण करते हुये शिव स्त्रोत व आरती का पाठ करके आरधना की जाती है। जिन कन्याओं के विवाह में बाधा आ रही है, वे तीज के रात्रि में माॅ पार्वती के निम्न मन्त्र ''ऊॅ उमायें नमः'' का जाप करें। यदि किसी महिला का पति उससे रूठा रहता और कहना नहीं मानता है, तो विधि पूर्वक तीज का व्रत रखकर रात्रि जागरण करे तथा निम्न मन्त्र से '' ऊॅ शान्तिरूपिण्यै नमः'' का जाप करें। यदि कोई लड़की प्रेम विवाह करना चाहती है किन्तु उसमें अड़चने आ रही है, तो तीज के दिन निर्जला व्रत रखकर माॅ पार्वती का विधिपूर्वक पूजन करें तथा निम्न मन्त्र ''ऊॅ पार्वत्यै नमः'' का रात्रि जागरण के दौरान जाप करें। निम्न मन्त्र का जाप करें यदि किसी महिला के सन्तान उत्पन्न होने में संकट आ रहा है, तो मां पार्वती का व्रत रखकर पूजन करें और रात्रि जागरण के दौरान निम्न मन्त्र '' ऊॅ जगत्यप्रतिष्ठायै नमः'' का जाप करें। जिस परिवार में कलह व अशान्ति का वातावरण बना रहता है एंव स्त्रियों को सताया जाता है। उस घर की महिलायें मां तीज के दिन मां पार्वती का व्रत रखकर सच्ची लग्न से पूजन करें तथा रात्रि जागरण के दौरान निम्न मन्त्र ''ऊॅ जगद्धात्रयै नमः'' का जाप करें।
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सोमवार, 29 जुलाई 2019
सोमवार, 22 जुलाई 2019
सावन में महिलाओं के हाथ में हरी चूड़ियां
धर्म : धार्मिक लिहाज से सावन का महीना तो काफी महत्वपूर्ण है ही साथ ही वैज्ञानिक और प्रेम के दृष्टिकोण से भी ये माह काफी मायने रखता है, इस वक्त आकाश से बारिश होती है, जिससे धरती पर शीतलता रहती है, चारों ओर हरियाली ही हरियाली नजर आती है जो कि आंखों और दिल को सकून देते हैं, इस महीने में एक और खास बात देखने को मिलती है और वो है महिलाओं और लड़कियों का हरा श्रृंगार, इस दौरान महिलाएं हाथों में मेंहदी रचाती हैं, हरी चूड़ियां पहनती हैं और हरे वस्त्र धारण करती हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि आखिर सावन के महीने में महिलाएं हरी चूड़ियां या हरा वस्त्र क्यों पहनती हैं। हरा रंग प्रेम और खुशी का प्रतीक हरा रंग सौभाग्य से जुड़ा होता है दरअसल हरा रंग प्रेम और खुशी का प्रतीक माना जाता है और इसी वजह से महिलाएं सावन के महीने में हरे रंग के श्रृंगार से भगवान और प्रकृति को धन्यवाद देती हैं और अपनी खुशी का इजहार करती हैं। हरा रंग सौभाग्य से जुड़ा होता है इसलिए इस माह बहुत से लोग हरे रंग का कपड़ा पहनना पसंद करते हैं।
हरा रंग शिव को प्रिय है और उन्हें खुश करने के लिए हरी चूड़ियां या हरा वस्त्र पहना जाता है और हाथों में मेंहदी लगाई जाती है, जिससे महिलाओं को अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान मिले। बुद्ध ग्रह का रंग बुद्ध ग्रह का रंग माना जाता है हरा रंग, इंसान की कामयाबी के लिए उसका करियर में सफल होना बहुत जरूरी है और इसके लिए बुद्ध ग्रह को खुश करने के लिए हरे रंग का श्रृंगार किया जाता है। चूड़ियों का महत्व चूड़ियां तो मन की चंचलता को दर्शाती हैं तो कंगना मातृत्व की ललक उत्पन्न करता हैं। इसलिए कंगन दुल्हनों का श्रृंगार है जब कि चूंड़ियां कुमारी कन्याएं भी पहनती हैं। हमारे साहित्यकारों ने भी इस श्रृंगार के बारे में इतना कुछ लिख दिया है जिसके बारे में बात करना बेहद कठिन हैं।
हरा रंग शिव को प्रिय है और उन्हें खुश करने के लिए हरी चूड़ियां या हरा वस्त्र पहना जाता है और हाथों में मेंहदी लगाई जाती है, जिससे महिलाओं को अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान मिले। बुद्ध ग्रह का रंग बुद्ध ग्रह का रंग माना जाता है हरा रंग, इंसान की कामयाबी के लिए उसका करियर में सफल होना बहुत जरूरी है और इसके लिए बुद्ध ग्रह को खुश करने के लिए हरे रंग का श्रृंगार किया जाता है। चूड़ियों का महत्व चूड़ियां तो मन की चंचलता को दर्शाती हैं तो कंगना मातृत्व की ललक उत्पन्न करता हैं। इसलिए कंगन दुल्हनों का श्रृंगार है जब कि चूंड़ियां कुमारी कन्याएं भी पहनती हैं। हमारे साहित्यकारों ने भी इस श्रृंगार के बारे में इतना कुछ लिख दिया है जिसके बारे में बात करना बेहद कठिन हैं।
सावन में क्यों होती है शिव की भस्म से आरती?
धर्म : सावन महीने का आज पहला सोमवार है, भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए इस समय श्रद्दालुओं की की भारी भीड़ मंदिरों के सामने एकत्र है। सावन का पहला सोमवार जातकों को सारी समस्याओं और बधाओं से मुक्ति दिलाने वाला है। सावन के पूजा का खास महत्व होता है, सावन हमेशा लोगों को खुशी, शांति और समृद्दि प्रदान करता है। सावन में भगवान शिव की विशेष तरह से पूजा होती है। लोग शिवलिंग को दूध और गंगाजल से नहलाते हैं तो कहीं-कहीं भस्म से आरती होती है।वैसे तो हर जगह मंदिरों के हिसाब पूजा होती है लेकिन उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में खास तरह की भस्म आरती होती है।
शिवजी हमेशा जंगलों और पहाड़ों में रहे हैं इसलिए उन्हें हमेशा पेड़-पौधे-मिट्टी से प्यार रहता है, ऐसा माना जाता है कि भस्म के जरिये इंसान उनके निकट पहुंचने की कोशिश करता है। राख हमेशा पवित्र मानी जाती है इसलिए लोग बर्तनों को राख से मांजते थे, इसलिए जब राख का तिलक किया जाता है तो इंसान का दिल-दिमाग हमेशा शुद्द हो जाता है। भस्म इंसान के अंदर एक शक्ति प्रदान करता है, भस्म धारण करने वाले भगवान शिव संदेश देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेना चाहिए।
शिवजी हमेशा जंगलों और पहाड़ों में रहे हैं इसलिए उन्हें हमेशा पेड़-पौधे-मिट्टी से प्यार रहता है, ऐसा माना जाता है कि भस्म के जरिये इंसान उनके निकट पहुंचने की कोशिश करता है। राख हमेशा पवित्र मानी जाती है इसलिए लोग बर्तनों को राख से मांजते थे, इसलिए जब राख का तिलक किया जाता है तो इंसान का दिल-दिमाग हमेशा शुद्द हो जाता है। भस्म इंसान के अंदर एक शक्ति प्रदान करता है, भस्म धारण करने वाले भगवान शिव संदेश देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेना चाहिए।
महिलाओं में बढ़ रहा है रुद्राक्ष पहनने का चलन
धर्म : पवित्र श्रावण मास में शिव-आराधना का विशेष महत्व है। शिव जी को प्रिय लगने वाले सभी चीज़ें श्रावण मास में संपन्न की जाती हैं चाहे वह अभिषेक हो, स्तुति हो, बिल्वपत्र अर्पण हो या फ़िर रुद्राक्ष धारण करना। रुद्राक्ष को शिवजी की आंख का अश्रु माना गया है। रुद्राक्ष एक फल की गुठली होता है। इस वृक्ष की सर्वाधिक पैदावार दक्षिण पूर्व एशिया में होती है। रुद्राक्ष का वृक्ष एक सदाबहार वनस्पति है जिसकी ऊंचाई 50 से 60 फ़ीट तक होती है। रुद्राक्ष के वृक्ष के पत्ते लंबे होते हैं। यह एक कठोर तने वाला वृक्ष होता है। रुद्राक्ष के वृक्ष का फूल सफेद रंग का होता है और इसमें लगने वाला फल शुरू में हरा, पकने पर नीला एवं सूखने पर काला हो जाता है। रुद्राक्ष इसी काले फल की गुठली होता है। इसमें दरार के सदृश दिखने वाली धारियां होती हैं जिन्हें प्रचलित भाषा में रुद्राक्ष का मुख कहा जाता है।यह धारियां एक से लेकर चौदह तक की संख्या में हो सकती हैं।
एकमुखी रुद्राक्ष अतिशुभ माना जाता है। इसे साक्षात् शिव का स्वरूप माना गया है, वहीं दोमुखी रुद्राक्ष को शिव-पार्वती का संयुक्त रूप माना जाता है। अनिष्ट ग्रहों की शांति हेतु रुद्राक्ष धारण की अहम् भूमिका होती है। रुद्राक्ष को लाल रेशमी धागे में धारण करने से अनिष्ट ग्रहों के दुष्प्रभावों में कमी आती है। सामान्यत: महिलाओं को रुद्राक्ष धारण करने की परंपरा नहीं है केवल साध्वियां ही रुद्राक्ष धारण करती देखी गई हैं। किन्तु वर्तमान समय में महिलाओं में भी रुद्राक्ष धारण करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। हमारे मतानुसार यदि महिलाएं रुद्राक्ष धारण करें तो अशुद्धावस्था आने से पूर्व इसे उतार दें एवं शुद्धावस्था प्राप्त होने पर पुन: धारण करें।
एकमुखी रुद्राक्ष अतिशुभ माना जाता है। इसे साक्षात् शिव का स्वरूप माना गया है, वहीं दोमुखी रुद्राक्ष को शिव-पार्वती का संयुक्त रूप माना जाता है। अनिष्ट ग्रहों की शांति हेतु रुद्राक्ष धारण की अहम् भूमिका होती है। रुद्राक्ष को लाल रेशमी धागे में धारण करने से अनिष्ट ग्रहों के दुष्प्रभावों में कमी आती है। सामान्यत: महिलाओं को रुद्राक्ष धारण करने की परंपरा नहीं है केवल साध्वियां ही रुद्राक्ष धारण करती देखी गई हैं। किन्तु वर्तमान समय में महिलाओं में भी रुद्राक्ष धारण करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। हमारे मतानुसार यदि महिलाएं रुद्राक्ष धारण करें तो अशुद्धावस्था आने से पूर्व इसे उतार दें एवं शुद्धावस्था प्राप्त होने पर पुन: धारण करें।
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